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चोट जब तुम्हे लगती है, तो उस दर्द का एहसास सिर्फ तुम्हे हो सकता है, किसी दूसरे को नहीं भले ही लोग तुम्हे सहारा देने का प्रयास करे, तुम्हारी मदद करने की कोशिश करे मगर तुम्हारे दर्द को कोई भी कम नहीं कर सकता।
इस दुनिया में जब हम आते है, तो हमारे जन्म के बाद हमारे कई रिश्ते जुड़ जाते है, जैसे माता पिता,भाई बहन,दादा दादी और भी कई रिश्ते नाते।जैसे-जैसे हम बड़े होने लगते है हमारे माता पिता हमे कई सीख और ज्ञान हमे प्रदान करते है, उचित संस्कारो का हमे उपदेश देते है, हम उनके द्वारा दिए गए उपदेश और ज्ञान का पालन करना शुरू कर देते है।
1. क्या है असली ज्ञान का परिचय ?
जब हम अपनी युवा अवस्था में पहुंच जाते है तो हमे सही और गलत की परख स्वतः ही होने लगती है, हम पहले से काफी समझदार होने लगते है। क्योकि उचित शिक्षा को ग्रहण करने के पश्चात भी यदि तुम्हारे भीतर ज्ञान की ज्योति का उदय यदि नहीं हुआ तो ये समझ लेना तुमने अपनी शिक्षा के साथ पक्षपात किया है अर्थात तुमने अपनी शिक्षा को दिल से ग्रहण नहीं किया। तभी बड़े हो कर भी तुम्हारे अंदर सही और गलत की परख नहीं।
आज कल के युवा बहुत जल्दी अपना आपा खो देते है, गुस्से में आ कर कोई भी निर्णय ले लेते है, जिससे उनका पूरा भविष्य और पूरा जीवन बर्बाद हो जाता है, बाद में जब उन्हें अपनी भूल का एहसास होता है तो वो अपने किए पर खुद पछताते है, आखिर क्यों मैंने ऐसे वचन कहे ? आखिर क्यों मैंने ऐसा निर्णय किया ? यदि मैं अपने आपे से बाहर नहीं गया होता तो आज ऐसी परिस्थिति देखने को नहीं मिलती।
2. आपके शब्द आपकी ताकत।
शब्द यदि मीठे और मधुर हो तो वो शब्द अमृत समान बन जाता है,शब्द यदि तीखे,कठोर और तीव्र हो तो वो शब्द एक भीषण तीर के समान घायल करने की ताकत रखता है जिसका सीधा असर व्यक्ति के दिल पर होता है, जो हमारे दिल को आघात करता है, जिसे हम सहन नहीं कर पाते और चाहे कोई कितना भी अजीज हो खास हो हमारा अपना हो हम उससे दूर होने लगते है। इसलिए जो बोले सोच समझ कर बोले, और ऐसा बोले जिसे सुनने के बाद कोई आपकी शिक्षा पर आपके ज्ञान पर प्रश्नचिन्ह ना लगाए।
* यदि वक्तुमिच्छसि तर्हि सद्वचनं वदसि, कठोरवचनं मा वदसि, शिक्षणेन पुस्तकपठनेन च किं लभ्यते, यदा त्वं सद्वचनं ज्ञात्वा वदसि।
अर्थात ,बोलना है तो अच्छे वचन बोले, ना बोले वचन कठोर,शिक्षा और पोथी पढ़ कर क्या मिला, जब तुमने सीखे ना अच्छे वचन और बोल।
लोग यदि विचार करे कि जो आघात वो दूसरे को पहुंचाते है, यदि वही आघात कोई उन्हें पहुंचाने का प्रयास करें तो उनके दिल पर क्या गुजरेगी ? यदि सब ऐसा सोचने लगे तो हमारा संसार एक सुंदर संसार के रूप में पुनः लौट आएगा।काश कि कोई किसी की पीड़ा का कारण ना बनता, काश कि इंसान अपने शब्दों का उचित प्रयोग करता,काश कि इस संसार में कोई अच्छा हो कर भी किसी की नजरों में बुरा ना होता।
भगवान ने तुम सबको इंसान बनाया, तुम सब एक इंसान हो तुम्हारे पास एक दिल है, तुम कैसे किसी दूसरे को हानि या कष्ट पहुंचा सकते हो ? क्या तुमने कभी अपने दिल से पूछा है कि क्या किसी दूसरे को कष्ट पहुंचा कर तुम्हारे दिल को आराम मिलता है या तुम्हारे दिल को भी क्षति पहुंचती है ? यदि दूसरे को कष्ट पहुंचा कर तुम्हे आनंद मिलता है तो ये समझ लेना तुम बस नाम के लिए इंसान हो, तुम्हारे अंदर की इंसानियत मर चुकी है, वो दिन दूर नहीं जब तुम्हे खुद के द्वारा किए गए प्रत्येक भूल का पश्चाताप होगा, जो तुमने दूसरो के साथ किया वही लौट कर तुम्हे कष्ट पहुंचाएगा।
मान और सम्मान भी दिलाते है शब्द,अपमान की वजह भी बनते है शब्द, कसूर शब्दों का नहीं, कसूर है वक्ता का, जिसे कब,कहां ,किस शब्दों का प्रयोग करना है इसका बोध ही नहीं।

