लौट रहा प्रकृति में संतुलन।

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क्रोध मेरा स्वभाव नहीं, ना ही संहार मेरा शौक, बस पापियों के लिए ही बढ़ता मेरा प्रकोप। 


क्यों कहलाती हूँ मैं प्रचंड, क्यों कहलाती हूँ मैं विकराल, आज सभी प्राणियों के मन में उठता यही सवाल। 


व्यर्थ ही ढूंढ रहे हो तुम मुझे मंदिरों में, मैं तो मौजूद हूँ कण- कण में, यदि तुमने अपने कर्मो को सुधार लिया तो मानो तुमने मुझको पा लिया। 


कैसे सोच लिया तुमने कि कलयुग मुझसे शक्तिशाली है ? ये ना भूलना धरती के कण-कण में मेरी ही शक्ति समाई है। 


मैं ही मोक्ष का द्वार हूँ, मैं नर्क का द्वार, जिसने जैसे कर्म किए वैसे ही करती मैं उनका उद्धार। 


मैं तुम्हारे कर्मो का आईना हूँ, मैं ही तुम्हारे कर्मो का परिणाम, मैं ही तुम्हारा भाग्य हूँ, मैं ही तुम्हारा दुर्भाग्य हूँ। 


जिसके मन में पाप होता है, मेरे उग्र रूप से उसे ही भय होता है,मेरे सच्चे भक्तों को मेरे उग्र रूप में भी सौम्यता का दर्शन होता है। 


अब समय है प्रकृति के इंसाफ का, अब समय है समस्त जगत के कल्याण का, अब समय है प्रकृति में बदलाव का, क्योकि अब समय खत्म हुआ अधर्म और अत्याचार का। 


नारियों में भी अब ममता ना रही, पुरुषों में भी अब रक्षा की भावना ना रही, ये सब देख प्रकृति अब नए युग का निर्माण करने जा रही। 


निराकार भी मैं, साकार भी मैं, प्रकृति में बदलाव का कारण भी मैं, बहुत खिलवाड़ किया तुमने प्रकृति के साथ, अब लेगी प्रकृति तुमसे अपना हिसाब। 

 

सतयुग से कलयुग तक लिया मैंने अवतार, फिर भी पहचान ना पाया मुझे ये संसार, क्योकि हर दिन करता रहा मानव, प्रकृति का तिरस्कार।  


मुझे ढूंढ पाना नहीं आसान, मुझे जान पाना नहीं आसान,क्योकि झूठ और फरेब की दुनिया में हर कोई करता बस अपना गुणगान। 


बहुत कर लिया तुमने अपनी मनमानी, बहुत पहुंचा लिया संसार को हानि, बन कर अज्ञानी तुमने कभी मेरी महिमा ना जानी। 


प्रकृति में अब संतुलन लौटने को है, पाप और अधर्म की कालिमा अब छटने को है, एक अंत के पश्चात अब एक नया आरंभ होने को है। 






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