अंधकार में प्रकाश।

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1. जीवन में दुःख के अंधकार को कैसे दूर करें ? 


जीवन में निरंतर कई परिवर्तन होते रहते है, कभी वो परिवर्तन आपके हित में होता है तो कभी वो परिवर्तन आप में बदलाव लाने के लिए होता है। कुछ लोग अपने जीवन में कई उतार चढ़ाव से हो कर गुजरते है फिर भी वो अपने चरित्र और अपने स्वाभिमान पर कोई आंच नहीं आने देते सदैव धर्म और न्याय का अनुसरण करते है ऐसे लोग बड़े से बड़े दुःख को भी पार कर अपने जीवन को सफल बना जाते है, चाहे कितना भी गहन अंधकार हो उस अंधकार को भी अपनी अच्छाई और इमानदारी से प्रकाश में बदल देते है। 


इस दुनिया में जो भी है वो क्षणभंगुर है, मगर ना जाने क्यों लोग क्षणिक सुख और आनंद के लिए अपने स्वाभिमान और चरित्र को भी दांव पर लगा जाते है। क्या मिलेगा तुम्हें किसी के जीवन से खेल कर ? क्या हासिल कर लोगे तुम किसी दूसरे का हक छीन कर ? कुछ प्राप्त नहीं होता, बल्कि अंत में ये जीवन नर्क से भी बदतर बन जाएगा, ना तो तुम्हारे पास कुछ बचेगा ना ही तुम कभी सर उठा कर चल सकोगे। 


2. किसके लिए जिंदगी के सभी रास्ते बंद हो जाते है ?


हमेशा याद रखना जो मनुष्य अपने स्वार्थ और लोभ में आ कर किसी गलत रास्ते पर चलने लगता है तो वो अपने लिए सभी रास्ते बंद कर देता है क्योकि बुराई का रास्ता एक ऐसा रास्ता है जहां कोई एक बार जाने की भूल करता है वो वहां से दोबारा वापस नहीं आ पाता उसी अंधकार में खो जाता है, मगर जो अच्छाई और सत्य के राह पर चलता है जो कभी स्वार्थ और लोभ में नहीं उलझता वो हर दुःख को सुख में बदल जाता है, उसके लिए कई रास्ते खुल जाते है क्योकि परमात्मा ऐसे इंसान को कभी अकेला महसूस नहीं होने देते इसलिए तो कहा है मैंने अंधकार में प्रकाश। ये कलयुग एक ऐसा अंधकार है जिसमे प्रकाश वही ला सकता है जिसके मन में कोई छल कपट नहीं। जो सदैव पुण्यकर्मो का अनुसरण करता आया है। 


कैसे भूल गया ये संसार, हर तरफ बढ़ रहा पाप का विस्तार, ये ना सोचना कलयुग में नहीं होता कोई चमत्कार, आ रही है वो मिटाने अंधकार। 


भवन्तः मां मन्दिरेषु अन्वेषयन्ति, यूयं सर्वे एकत्र जागृतान् धारयन्ति, यदा भवन्तः कस्यचित् पीडयन्ति तदा किमर्थं मम नाम केवलं प्रदर्शनार्थं जपन्ति? नाहं मन्दिरे नाहं हृदये, धर्मे न्याये च प्रतिष्ठितः इति सर्वदा स्मर्यताम्।


अर्थात, मंदिरों में मुझे ढूंढते हो, मिलकर सब जगराते करते हो, जब तुम किसी पर अत्याचार करते हो, फिर क्यों दिखावे का मेरा नाम जपते हो ? ना मैं मंदिर में हूँ, ना मैं तुम्हारे अंतर्मन में हूँ, हमेशा याद रखना मैं धर्म और न्याय में स्थापित हूँ। 


अब भी समय है जो सत्य को नहीं समझ पा रहे वो वास्तविक सत्य को समझने का प्रयास करें अन्यथा जब आपका सामना कलयुग के अंत में वास्तविक सत्य से होगा तो आपकी आँखों में पछतावे के अश्रु होंगे और आप सदा के लिए  दिव्य प्रकाश से दूर हो कर एक गहन अंधकार में समाहित हो जाएंगे। 



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